Radha। Who appeared on this earth to explain the definition of love। part 1 - Brij Bhakti - Untold Story Of Vrindavan
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Radha। Who appeared on this earth to explain the definition of love। part 1

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Goddess Radha Rani
Goddess Radha Rani

“Radha” अधिकतर लोग जो कृष्ण की राधा के बारे मे बाते करते है, राधा कृष्ण के प्रेम की चर्चा किया करते है। श्रीराधाजी श्रीकृष्ण को मन, धन से प्रेमी रूप मे पूजन करती थी और श्री कृष्ण भी अपनी राधा को अधिकाधिक प्रेम करते थे। जिनके प्रेम जोडी आज के नवयुगलों को उत्साहित करते है और राधा और कृष्ण के प्रेम गाथा से प्रेम मे समर्पित होने की प्रेरणा प्रदान करते है।

राधा को भगवान कृष्ण की शक्ति स्वरूपा भी माना जाता है , जो स्त्री रूप मे प्रभु के लीलाओं मे प्रकट होती हैं। “गोपाल सहस्रनाम” के 19वें श्लोक मे वर्णित है कि महादेव जी द्वारा जगत देवी पार्वती जी को बताया गया है कि एक ही शक्ति के दो रूप है “श्री राधा और श्रीकृष्ण”। अर्थात राधा ही कृष्ण हैं और कृष्ण ही राधा हैं।

हमारी संस्कृति में हर देव हर देवी को अलग-अलग भाव के लिए पूजा जाता है राम को मर्यादा के लिए तो सीता को सहनशीलता के लिए, विष्णु को संचालन के लिए तो लक्ष्मी को वैभव दान के लिए, पार्वती शक्ति का रूप है तो शिव वैराग्य का। पर जब बात प्रेम के भाव की आये तो एक ही जोड़ा ऐसा है जिसे साथ साथ नमन किय जाता है वो है श्री राधा और श्रीकृष्ण ”राधाकृष्ण“।

 
पर इस धरती पर घटी राधाकृष्ण की आलौकिक प्रेम कथा जानने से पहले हमें जानना होगा आखिर वो इस धरा पर क्यों आये? क्यों प्रेम क सही परिभाषा समझाने उन्हें इस धरा पर अवतार लेना पड़ा ? और ये सब जानने के लिए हमें जाना होगा गोलोक जहाँ युग-युगान्तर से श्री राधाकृष्ण बस्ते है।

Golok Dham
Golok Dham

 Golok Dham

Radha Rani Golok Dham (गोलोक धाम) जो अपने अंदर असीम सुख, शांति व समृद्धि अपने अंदर समेटे है , उस धाम का कही अंत ही नहीं दिखता था। समय से परे, माया से परे, तीनों गुणो से परे, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार व समस्त 16 विकारों से भी परे उस सनातन गोलोक धाम (वृन्दावन) के दर्शन करने का सौभाग्य बड़ी मुश्किल से सिर्फ और सिर्फ श्रीराधाकृष्ण के परम भक्तों को ही मिल पाता है।

Golok Dham(गोलोक धाम) जहाँ पर हमारे प्रिय-प्रियतम नित्य रास विहार लीला करते है जहाँ गोलोक धाम (वृन्दावन) में महारास लीला होती रहती है श्री राधारानी श्री कृष्ण का श्रृंगार पंचतत्व से करती है और श्री कृष्ण राधा जी की सेवा किया करते है जहाँ की सौन्दर्यता का वर्णन करना भी असम्भब दिखाई देता है ऐसा है गोलोक धाम

एक बार भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त श्री दामा जी ब्रह्मा जी का संदेश लेकर नारद मुनि के साथ गोलोक धाम जाने लगे रास्ते में असंख्य ब्रम्हाण्डों को पार करने के जब वह गोलोक धाम पहुंचे तो श्री नारद मुनि ने श्री दामा जी से भगवान का नाम स्मरण करने को कहा जिससे गोलोक का द्वार खुल सके।

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नारद मुनि के कहने पर श्रीदामा जी ने वैसा ही किया और प्रभु श्री कृष्ण का नाम लेने लगे लेकिन ना कोई मार्ग ना कोई द्वार उन्हें दिखाई दिया तो वह चिंतित हो गए और श्री नारद मुनि से कहने कहा। जिस पर नारद मुनि कहने लगे नाम अधूरा लोगे तो कैसा काम पूर्ण होगा यहाँ प्रवेश करने के लिए श्रीकृष्ण से पहले “श्रीराधा” का नाम लेना होगा।

जिस पर दामा जी क्रोधित हो गए और कहने लगे Radha तो प्रभु श्री कृष्ण की प्रेमिका है मैं भगवान श्री कृष्ण से पहले उसका नाम नहीं ले सकता क्युकी ये मेरी भक्ति का अपमान है और मैं अपनी भक्ति का अपमान नहीं कर सकता तब नारद मुनि ने श्री दामा के लिए गोलोक का द्वार खोलने के लिए श्रीराधाकृष्ण-श्रीराधाकृष्ण कहने लगे जिससे वहाँ गोलोक का द्वार खुल गया और नारद जी श्री दामा के साथ गोलोक धाम में प्रवेश कर गए। 

Radha ji had to come to earth because of this curse (राधा जी को इस श्राप के कारण धरती पर आना पड़ा)

golok dham
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गोलोक धाम में प्रवेश करने के बाद श्री दामा देखते है प्रभु श्रीकृष्ण श्रीराधा जी की सेवा कर रहे है और श्री राधा कृष्ण अपने असीम प्रेम में खोये हुए यमुना जी के किनारे बैठे हुए है।

  जिससे श्री धामा अपने प्रभु को उनकी प्रेमिका की सेवा करते देख और भी ज्यादा क्रोधित हो जाते है कुछ दिनों पश्चात जब राधा जी की अनुपस्तथि में भगवान श्रीकृष्ण अपनी 16108 पत्नियों में से एक विरजा के साथ विहार कर रहे थे।

तब अपने प्राणों से भी प्रिय श्रीकृष्ण को किसी अन्य स्त्री के साथ विहार करते हुए राधारानी से रहा नहीं गया और उन्होंने श्री कृष्ण को अपवचन कह दिए श्रीराधा के क्रोध से विचलित होकर विरजा ने नदी का रूप लेकर वहाँ से अंतरध्यान हो गयी। 

उस समय श्रीकृष्ण के मित्र और सेवक श्रीदामा को राधा जी का श्री कृष्ण को अपवचन कहना बिलकुल ठीक नहीं लगा और उन्होंने क्रोध में आकर राधारानी का बहुत अपमान किया। श्री दामा अपने प्रभु श्री कृष्ण के लिए राधा के मुख से कटुवचन नहीं सुन पाए, और क्रोध में उनसे भी यह पाप हो गया श्री दामा के ऐसे व्यवहार से श्री राधाजी और भी क्रोधित हो गयी और उन्होंने श्री दामा को अगले जन्म में राक्षस बनने का श्राप दिया।

 राधारानी ने श्रीकृष्ण को पाने के लिए की थी मां कात्यायनी के इस शक्तिपीठ की पूजा

तब इसके जबाब में श्रीदामा ने राधा को पृथ्वी लोक पर मानव रूप में जन्म लेने का श्राप दिया साथ ही श्रीदामा ने यह श्राप दिया कि मानव रूप में वह अपने प्राणप्रिय को सदा भूली रहेंगी एवं श्रीकृष्ण को पाने के लिए तरसेगी। राधाकृष्ण के अटूट प्रेम की वजह से श्रीकृष्ण ने श्री राधा जी के जन्म लेने से पहले गोलोक धाम को इस पृथ्वी पर वृन्दावन के रुप में अपने ह्रदय से प्रकट किया।

 राधा

राधा

अगले जन्म में इसी श्राप के कारण श्रीदामा शंखचूर्ण नामक असुर बना वही श्राप के कारण श्रीराधा जी ने बृषभानु जी और माता कीर्ति के घर में जन्म लिया।

“Shri Radha ji was born in the house of Brishabhanu ji and Mother Kirti”

राधा रानी जी श्रीकृष्ण जी से ग्यारह माह बड़ी थीं। लेकिन श्री वृषभानु जी और कीर्ति देवी को ये बात जल्द ही पता चल गई कि श्री किशोरी जी ने अपने प्राकट्य से ही अपनी आंखे नहीं खोली है।

इस बात से उनके माता-पिता बहुत दुःखी रहते थे। कुछ समय पश्चात जब नन्द महाराज कि पत्नी यशोदा जी गोकुल से अपने लाडले के साथ वृषभानु जी के घर आती है तब वृषभानु जी और कीर्ति जी उनका स्वागत करती है यशोदा जी कान्हा को गोद में लिए राधा जी के पास आती है। जैसे ही श्री कृष्ण और राधा आमने-सामने आते है। तब राधा जी पहली बार अपनी आंखे खोलती है।

श्रीराधा रानी के आसुओं से बना है यह कुंड

अपने प्राण प्रिय श्री कृष्ण को देखने के लिए, वे एक टक कृष्ण जी को देखती है, अपनी प्राण प्रिय को अपने सामने एक सुन्दर-सी बालिका के रूप में देखकर कृष्ण जी स्वयं बहुत आनंदित होते है। जिनके दर्शन बड़े बड़े देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

तत्वज्ञ मनुष्य सैकड़ो जन्मों तक तप करने पर भी जिनकी झांकी नहीं पाते, वे ही श्री राधिका जी। पृथ्वी लोक पर जन्म लेने के कुछ समय बाद श्री राधा रानी के जीवन पर पूर्वजन्म में मिले श्राप का असर पड़ना शुरू हो गया। वृन्दावन में की हुई महारास और अन्य लीलायें करने के बाद भगवान श्री कृष्ण को कंस से युद्ध करने के लिए वृन्दावन से मथुरा जाना पड़ा और श्रीराधाकृष्ण के वियोग की शुरुआत हुई।

श्री कृष्ण के जाने के बाद श्रीराधाजी का विवाह एक वैश्य रापाण से हो गया और वो सदा के लिए श्री कृष्ण से दूर हो गयी। श्री राधा रानी के बारे में कहा जाता है कि वो अपने पति रापाण के पास अपनी छाया स्थापित कर गोलोक धाम लौट गयी। इसी तरह श्री दामा के श्राप के कारण “Radha” और “Krishna” मिलन नहीं हो पाया लेकिन उनका प्रेम आज भी अजर-अमर है।…कहानी अभी आगे बाकी है। 


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