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Gopeshwar Mahadev Temple, Vrindavan || जहां विराजे है गोपी रूप में महादेव

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Gopeshwar Mahadev Temple, Vrindavan

Gopeshwar Mahadev Temple Vrindavan में Nidhivan Temple के पास कुंज गलियों में स्थित है | भगवन शिव का यह मंदिर श्री कृष्णा की लीलाओ पर आधारित है इस बृजमण्डल में भगवन भोलेनाथ की लीला का वर्णन है | जिस समय भगवन श्री कृष्णा जी ने निज वृन्दावन में महारास कर रहे थे तो वंशी की धुन सुनकर महादेव जी कैलाश मानसरोवर से निज वृन्दावन में आ गए स्वयं भोले नाथ भगवन श्रीकृष्ण जी का महारास देखने के लिए लालायित थे |

तो माता पार्वती जी भी भगवन शिव जी के पीछे पीछे आ गयी , उन पर भी न रहा गया | परन्तु पार्वती  माता तो महारास में प्रवेश कर  गयी परन्तु गोपीयो ने भगवन शिव को रोक दिया | गोपियों ने कहा कि महारास में केवल गोपियों का आगमन है यह तो गोपियों का महारास है यहां पुरुषों का आना मना है सभी असंख्य गोपियां रात्रि के समय महारास करेंगी। यहां तो केवल कृष्ण जी ही पुरुष हैं।

भोलेनाथ जी बोले मेरी पत्नी अंदर गई है मैं रात्रि यहां क्या करूंगा मैं बहुत दूर Kailash Maansarovar से आया हूं तभी गोपिया बोली आप अंदर नहीं जा सकते।भोलेनाथ गोपियों से प्रार्थना करने लगे मैं महारास देखे बिना नहीं जाऊंगा गोपी बोली मुझे आप पर दया आ रही है आप कहे तो एक उपाय है। एक गोपी बोली की आप यमुना जी में स्नान करोगे तो गोपी रूप धारण हो जाएगा तभी भोलेनाथ ने जाकर यमुना में स्नान किया

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Gopeshwar Mahadev Temple 

तो भोलेनाथ गोपी रूप में आ गए और महारास में प्रवेश किया महारास में देखा कि जितनी गोपिया हैं उतने ही कृष्ण हैं सभी गोपिकाएँ महारास ने मंत्रमुग्ध थी तो कृष्ण जी ने देखा कि महारास में स्वयं भोलेनाथ आए हुए हैं तभी कृष्ण जी ने राधा जी की गलवहियाँ छोड़ते हुए कहने लगे गोपेश्वरी स्वागतम और बांसुरी बजाते हुए भोलेनाथ के साथ महारास करने लगे भोलेनाथ भी अपने आप को ना रोक सके और धीरे-धीरे तांडव रूप में आ गए और फिर सिर से ओढनी गिर गई और भोलेनाथ की जटाएँ दिखने लगी |

तो सभी गोपीकाएँ व श्रीराधारानी उनके रूप को देखकर चकित रह गई तभी कृष्ण जी के मुख से योगेश्वरी कहना चाहते थे परंतु मुख से गोपेश्वरी निकल गया तभी राधा रानी जी व समस्त गुपीकायें नाराज हो गई और मानसरोवर चली गई।

 


maan Sarovar

कृष्ण जी ने राधा रानी से कहा क्या बात है क्या हुआ तभी राधा रानी ने कहा कान्हा तू तो बड़ा छलिया है और छीनरा है महारास करते हमें छोड़कर दूसरी गोपी के पास चले गए और उसे गोपेश्वरी कहा और हमारा मान गिराया तुम्हें शर्म नहीं आती तभी कृष्ण जी ने कहा आप समझ रही हैं

वह बात नहीं है वह तो स्वयं भोले नाथ महारास देखने के लिए गोपी रूप बनाकर महारास में आए हैं आप तो यहां पर आ गई। महारास करते-करते तांडव रूप करने लगे और उनके सिर से ओढनी गिर गई यह बात सुनकर राधा रानी मुस्कुरा गई |

Gopeshwar Mahadev Temple, Vrindavan

फिर जा कर भोलेनाथ से पूछने लगी।  कैसे आए भगवान भोलेनाथ । तो भोलेनाथ ने कहा कि मुझे आप की प्रेम लीला देखनी थी तभी मैं गोपी रूप धारण करके महारास में आया था तभी राधा रानी बोली वरदान मांगो क्या चाहते हो। भगवान शिव ने राधा रानी से कहा कि मैं ना तो कैलाश मानसरोवर जाऊंगा और ना  काशी मैं आपका प्रत्येक दिन रास देखूंगा। कृपया करके आप इस निज वृंदावन में निजनिवास देने की कृपा करें |तभी राधा रानी ने पृथ्वी पर शिवलिंग के रूप में भगवान शिव को प्रकट किया तथा सभी गोपियों ने पूजा अर्चना करके भगवान शिव को Gopeswar Mahadev Temple vrindavan का नाम दिया |

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तभी राधा रानी ने कहा इस ब्रज में जो भी तीर्थयात्री बगैर आपके दर्शन करके जाएगा उसके ब्रज यात्रा अधूरी रह जाएगी। द्वापर युग से शिवलिंग यही वृन्दावन में विराजमान है। भगवान कृष्ण और राधा रानी जी ने इनकी स्थापना की कालांतर में लुप्त हो गए।

तब भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र श्री बृजनाभ जी ने शांडिल्य ऋषि से पूछ कर इनकी पुनः स्थापना की श्री बृजनाथ जी ने चार महादेव चार देवियां और चार देवों की स्थापना की जब भगवान कृष्ण जी और राधारानी जी ने शिव पूजा का आयोजन रखा है तो पार्वती जी भी वहाँ आ  गई और कहा कि-

मैं भी भगवान  शिव जी के साथ बैठूंगी तभी शिव जी ने रोक दिया कि नहीं तुम मेरे साथ नहीं बैठूंगी यह पत्नी का कर्तव्य है कि पति को छोड़कर तुम पहले इस रात में चली गई इसलिए आप मेरे साथ नहीं बल्कि बाहर बैठी हो क्योंकि मैं यहां गोपेश्वर के रूप में विराजमान हूं

आपके साथ बैठने पर मुझे ब्रजवासी कैसे पहचानेंगे। पृथ्वी पर जितने भी शिव मंदिर हैं परंतु यह एक ब्रज में अनोखा मंदिर है जहाँ पार्वती जी गणेश जी व नंदी जी मंदिर के बाहर विराजमान हैं।
    इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा अनोखे रूप में करते हैं प्रातः 11:30 बजे तक चल दूध तथा पंचामृत से इनका अभिषेक किया जाता है तथा उसके बाद नित्य नियम से गोपी के रूप में लहंगा चोली सिंदूर आंखों में काजल पैरों में महावर लगाकर प्रतिदिन सजाया जाता है

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इस रूप के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से देश व विदेशों से यात्री आते हैं इस मंदिर में शिवरात्रि पर विशेष पूजा अर्चना का आयोजन करते हैं सावन के चार सोमवार को दर्शन करने का विशेष महत्व माना जाता है यह शिवमूर्ति आपको भारत वर्ष में केवल भगवान कृष्ण की जन्मभूमि लीला भूमि वृंदावन में ही केवल दर्शन के लिए मिलेगी।


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