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Radha Krishna Vivah | क्या सच मे राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था ? Bhandir Van-भांडीर वन

 

Radha Krishna Vivah

Radha Krishna Vivah | क्या सच में राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था ?

 

Radha Krishna Vivah Lila ( राधा-कृष्ण विवाह लीला )

श्रृंगार रस पक्ष की सबसे प्रधान लीला है- ”प्रिय प्रियतम की विवाह लीला।” संसार में बहुत लोग राधा-कृष्णा के विवाह से सर्वथा अनभिज्ञ है और इसलिए उटपटांग प्रश्न भी कर देते हैं- ”क्या राधा-कृष्णा का विवाह हुआ था?” बहुत से मिथ्या भ्रम में है कि विवाह ही नहीं है।

इस भ्रम के निवारण हेतु आज हम आपको प्रमाण सहित रसिकाचार्यो की वादी के द्वारा रसमयी- विवाह लीला के बारे में बताने जा रहे है जोकि वक्ता, श्रोता, अध्येता के मन को दिव्य रास-सिंधु में आनंदमयी कर देती है।

यू तो राधा-माधव की प्रत्येक लीला रास का पुंजीभूत स्वरुप है, अनेकों रसाचार्यों ने रसमयी इस विवाह-लीला के नायक दूल्हा श्रीकृष्ण एवं दुल्हन श्रीराधिका को ही अपना आराध्य स्वीकार किया है जैसे- श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय के जनक ; श्री श्री हित हरिवंश जी महाप्रभु’ , श्री बांकेबिहारी सम्प्रदाय के जनक ‘, ”श्री श्री हरिदास जी महाराज’ आदि।

श्री बांके बिहारी विनय पचसा हिंदी में

एक बार ही नहीं , अनेकों बार एवं विविध स्थानों पर राधा-माधव की विवाह लीला रसवेदीजनों ने गाई है। राधा-कृष्णा की विवाह लीला बृज में ५ स्थानों पर हुई है जिसमें भांडीर वन एक है।

radha krishna vivah sthali

Radha Krishna Vivah Sthali Bhandir Van (भांडीर वन में विवाह)

यहाँ के विवाह का प्रसंग ( गर्गसंहिता गोलोक खंड अध्याय १६ )(ब्रम्हवैवर्तपुराण कृष्ण जन्म खंड अध्याय १५ ) दोनों में प्राप्त होता है। दोनों ग्रंथों का यह प्रकरण सामान ही है।

Radha Krishna Vivah sthaliएक समय श्री नन्द बाबा अपने लाड़ले लाल को अपने सीने से लगाए हुए भांडीर उपवन में गौ-चारण के लिए गये। लीलाबिहारी की इच्छा से अचानक वहाँ सनसन… सं.. सन करते हुए बड़े वेग से हवा चलने लगी। उस समय झंझावात ने नन्द जी को झकझोर दिया।

बाबा को भय उत्पन्न हो गया, पेड़ों से पत्ते टूट कर गिरने लगे। चारो तरफ धूलभरा अंधकार छा गया, थोड़ी देर में आकाश को काले बादलों ने ढक लिया। सम्पूर्ण वन प्रान्त में घोर नीलिमा का साम्राज्य हो गया। नन्दलाल भी भय के अभिनय में रुदन करते हुए बाबा के कंठ से जोर से लिपट गए।

बाबा विचार ही कर रहे थे कि कैसे कृष्ण को शीघ घर पहुँचाऊ , तब तक करोड़ो सूर्य समूह के समान दिव्य- स्वरूपा खंजन-गर्व-गंजनकारिणी श्री रसेश्वरी राधा जी वहाँ प्रकट हो गयी। श्रीजी के तेज को देखकर नन्द जी ने नत हो उन्हें नमन किया एवं हाथ जोड़कर कहा- ”हे राधे ! गर्ग जी से मुझे आप दोनों के विषय में सब ज्ञान हो गया है।

पूर्ण पुरुसोत्तम ये श्री कृष्ण ही तुम्हारे प्राण वल्लभ है एवं तुम इनकी प्राणवल्लभा हो। लीला सिद्धि की दृष्टि से ये भयभीत हो गए हैं , अब तुम किसी भी प्रकार से इन्हे भवन तक पहुँचाओ।” साथ ही नंदजी ने युगल के चरणारविंदों में सुदृढ़ भक्ति व संतों में प्रेम प्राप्त होने का वर माँगा।राधाकृष्णा का विवाह

वर देकर श्रीजी ने नन्दजी के अंक से नन्दलाल को अपनी गोद में ले लिया। नन्द जी के वहां से गमनोपरांत श्री जी भांडीर-उपवन में आई। वहाँ दिव्य भू देवी का आभिर्भाव हुआ। वृन्दावन , यमुना , गिरी-गोवर्धन दिव्य सज्जा से सुज्जित हो गए।

तत्काल श्रीकृष्ण भी किशोर रूप ग्रहण करके राधाभिमुख खड़े हो गए। उस समय दोनों का दिव्य-वपु आभूषणों को विभूषित कर रहा था।  लाल जी ने श्रीजी का करतल अपने करतल में लेकर विवाह मण्डप में प्रवेश किया।  प्रभु के इच्छानुसार सत्यलोक से ब्रम्हा जी आये।

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ब्रम्हाजी ने युगल सरकार को प्रणाम किया और बोले – ”आप दोनों नित्य-दम्पति होकर भी प्रेम-रस पिर्यास एवं भक्तानुग्रहार्थ ही यह लीला कर रहे हैं। अब आपकी आज्ञानुसार मैं लोकव्यवहार के सिद्धयर्थ लोकरीति से वैवाहीक-विधि संपन्न कराऊंगा।”

अनन्तर ब्रम्हाजी ने श्रीराधा-माधव को अगनि के सम्मुख बिठाकर वैदिक विधानपूर्वक पाणिग्रहण संपन्न कराया।  उसके बाद अग्नि की ७ भाँवरि (फेरे) कराए।

Bhandir Van

     स वाहयामास हरि च राधिका प्रदक्षिणं सप्तहिरुण्यरेतस: ।
     ततश्च तौ तं प्रणमय्य वेदवित्तौ पाठयामास च सप्तमंत्रकंम् ।।
                                                                                                                 (ग. सं.गो. ख .१६/३१)

     युगल सर्कार को प्रणाम करके उनसे ७ वैदिक मंत्र पढ़वाए –                

     कौतुकं कारयामास सप्तधा च प्रदक्षिणाम् ।
     पुनः प्रदक्षिणां राधां कारयित्वा हुताशनम्।।
                                                                                      (ब्र.वै.पु.-कृ ज ख-१५/१२५-१२६ )

7 अग्निप्रदक्षिणा के बाद ब्रम्हा जी ने श्रीकृष्ण के वक्ष पर श्रीजी का कर रखवाया एवं श्रीकृष्ण का कर श्रीजी के पृष्ठदेश में स्थापित करके उनसे उच्च स्वर से मंत्रोच्चारण कराया। अनन्तर श्रीजी के कराम्बुजों से पारिजात पुष्पों की केसर से सनी आजानुलम्बित माला श्रीकृष्ण के कंठ में धारण कराई।

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इसी प्रकार श्रीकृष्ण के द्वारा श्रीजी को माला धारण करवाकर ब्रम्हाजी ने युगल सरकार से अग्निदेव को प्रणाम करवाया। इसके पश्चात जिस प्रकार एक पिता अपनी कन्या को सुयोग्य वर के हाथ में सौंपता है , उसी प्रकार ब्रम्हाजी ने पितृ-कर्तव्य का पालन करते हुए कन्यादान किया।

 

radha krishna vivah sthali

 

श्रीजी का कर श्रीकृष्ण के हाथ में सौप दिया। देवगण अविराम पुष्पवर्षा करने लगे, देवांगनाएँ नृत्य एवं गन्धर्व , विद्याधर मांगलिक-गान करने लगे। बार-बार राधावर श्रीकृष्ण चन्द की जयध्वनि होने लगी। मृदंग , विणा , वेणु , नगाड़े , दुंदुभि आदि अनेकानेक वाद्य बजने लगे। दक्षिणा के रूप में ब्रम्हाजी जी ने श्रीजी-ठाकुरजी से युगल चरणकमलों में भक्ति की याचिका की। इस प्रकार भांडीर वन में श्रीराधा-कृष्ण का विवाह सम्पन्न हुआ।

radha krisna ki shadi kaise huiतदनन्तर निकुञ्जभवनमें प्रियतमा द्वारा अर्पित दिव्य मनोरम चतुर्विध अन्न परमात्मा श्रीहरि ने हँसते-हँसते ग्रहण किया और श्रीराधा ने भी श्रीकृष्ण के हाथों से चतुर्विध अन्न ग्रहण करके उनकी दी हुई पान-सुपारी भी खायी। इसके बाद श्रीहरि अपने हाथ से प्रिया का हाथ पकड़कर कुञ्जकी ओर चले।

वे दोनों मधुर आलाप करते तथा वृन्दावन, यमुना तथा वनकी लताओं को देखते हुए आगे बढ़ने लगे। भ्रमरों और मयूरों के कल- कूजन से मुखरित लताओं वाले वृन्दावन में वे दूसरे कामदेव की भाँति विचर रहे थे।

तत्पश्चात् श्रीकृष्णने यमुना में प्रवेश करके वृषभानु- नन्दिनी के साथ विहार किया। वे यमुनाजल में खिले हुए लक्षदल कमल को राधा के हाथ से छीनकर भाग चले । तब श्रीजी ने भी हँसते-हँसते उनका पीछा किया और उनका पीताम्बर, वंशी तथा बेंतकी छड़ी अपने अधिकारमें कर लीं ।

radha krishna marrige
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श्रीहरि कहने लगे – ‘मेरी बाँसुरी दे दो ।’ तब राधाने उत्तर दिया- ‘मेरा कमल लौटा दो ।’ तब देवेश्वर श्रीकृष्णने उन्हें कमल दे दिया। फिर राधाने भी पीताम्बर, वंशी और बेंत श्रीहरि के हाथ में लौटा दिये। इसके बाद फिर यमुनाके किनारे उनकी मनोहर लीलाएँ होने लगीं

तदनन्तर भाण्डीर वनमें जाकर व्रज-गोप- रत्न श्रीनन्दनन्दन ने अपने हाथों से प्रिया का मनोहर शृङ्गार किया- उनके मुखपर पत्र – रचना की, दोनों पैरों में महावर लगाया, नेत्रोंमें काजलकी पतली रेखा खींच दी तथा उत्तमोत्तम रत्नों और फूलों से भी उनका शृङ्गार किया। इसके बाद जब श्रीराधा भी श्रीहरिको शृङ्गार धारण करानेके लिये उद्यत हुईं, उसी समय श्रीकृष्ण अपने किशोररूपको त्यागकर छोटे-से बालक बन गये ।

bhandirvanनन्द जी ने जिस शिशु को जिस रूप में राधा के हाथों में दिया था, उसी रूपमें वे धरतीपर लोटने और भयसे रोने लगे। श्रीहरिको इस रूपमें देखकर श्रीराधिका भी तत्काल विलाप करने लगीं और बोलीं- ‘हरे ! मुझपर माया क्यों फैलाते हो ?’

इस प्रकार विषादग्रस्त होकर रोती हुई श्रीराधासे सहसा आकाशवाणीने कहा- ‘राधे ! इस समय सोच न करो। तुम्हारा मनोरथ कुछ कालके पश्चात् पूर्ण होगा’

यह सुनकर श्रीराधा शिशुरूपधारी श्रीकृष्ण को लेकर तुरंत व्रजराजकी धर्मपत्नी यशोदाजीके घर गयीं
और उनके हाथमें बालक को देकर बोलीं- ‘आपके पतिदेव नन्द जी ने मार्ग में इस बालक को मुझे दे दिया था ।’

उस समय नन्द- गृहिणीने श्रीराधासे कहा– ‘ -‘वृषभानु- नन्दिनि राधे ! तुम धन्य हो; क्योंकि तुमने इस समय, जब कि आकाश मेघोंकी घटासे आच्छन्न है, वनके भीतर भयभीत हुए मेरे नन्हे से लालाकी पूर्णतया रक्षा की है।’ यों कहकर नन्दरानीने श्रीराधाका भलीभाँति सत्कार किया और उनके सद्गुणोंकी प्रशंसा की। इससे वृषभानुनन्दिनी श्रीराधाको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे यशोदाजी की आज्ञा ले धीरे-धीरे अपने घर चली गयीं ॥

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